श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

एतदन्तः समाम्‍नायो योगः सांख्यं मनीषिणाम्।

त्यागस्तपो दमः सत्यं समुद्रान्ता इवापगाः॥ ३३

etadantaḥ samāmnāyo yogaḥ sāṃkhyaṃ manīṣiṇām|

tyāgastapo damaḥ satyaṃ samudrāntā ivāpagāḥ|| 33

अर्थ

जिस प्रकार सभी नदियाँ घूम-फिरकर समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार मनस्वी पुरुषोंका वेदाभ्यास, योग-साधन, आत्मानात्मविवेक, त्याग, तपस्या, इन्द्रियसंयम और सत्य आदि समस्त धर्म, मेरी प्राप्तिमें ही समाप्त होते हैं। सबका सच्चा फल है मेरा साक्षात्कार; क्योंकि वे सब मनको निरुद्ध करके मेरे पास पहुँचाते हैं॥ ३३॥✎ 1676

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1676 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आत्मानात्म-विवेक, → आत्मानात्मविवेक,

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