॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.47.33
एतदन्तः समाम्नायो योगः सांख्यं मनीषिणाम्।
त्यागस्तपो दमः सत्यं समुद्रान्ता इवापगाः॥ ३३
etadantaḥ samāmnāyo yogaḥ sāṃkhyaṃ manīṣiṇām|
tyāgastapo damaḥ satyaṃ samudrāntā ivāpagāḥ|| 33
अर्थ
जिस प्रकार सभी नदियाँ घूम-फिरकर समुद्रमें ही पहुँचती हैं, उसी प्रकार मनस्वी पुरुषोंका वेदाभ्यास, योग-साधन, आत्मानात्मविवेक, त्याग, तपस्या, इन्द्रियसंयम और सत्य आदि समस्त धर्म, मेरी प्राप्तिमें ही समाप्त होते हैं। सबका सच्चा फल है मेरा साक्षात्कार; क्योंकि वे सब मनको निरुद्ध करके मेरे पास पहुँचाते हैं॥ ३३॥✎ 1676