श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

विसृज शिरसि पादं वेद‍्म्यहं चाटुकारै-

रनुनयविदुषस्तेऽभ्येत्य दौत्यैर्मुकुन्दात्।

स्वकृत इह विसृष्टापत्यपत्यन्यलोका

व्यसृजदकृतचेताः किं नु सन्धेयमस्मिन्॥ १६

visṛja śirasi pādaṃ vedmyahaṃ cāṭukārai-

ranunayaviduṣaste'bhyetya dautyairmukundāt|

svakṛta iha visṛṣṭāpatyapatyanyalokā

vyasṛjadakṛtacetāḥ kiṃ nu sandheyamasmin|| 16

अर्थ

अरे मधुकर! देख, तू मेरे पैरपर सिर मत टेक। मैं जानती हूँ कि तू अनुनय-विनय करनेमें, क्षमा-याचना करनेमें बड़ा निपुण है। मालूम होता है तू श्रीकृष्णसे ही यही सीखकर आया है कि रूठे हुएको मनानेके लिये दूतको—सन्देश-वाहकको कितनी चाटुकारिता करनी चाहिये। परन्तु तू समझ ले कि यहाँ तेरी दाल नहीं गलनेकी। देख, हमने श्रीकृष्णके लिये ही अपने पति, पुत्र और दूसरे लोगोंको छोड़ दिया। परन्तु उनमें तनिक भी कृतज्ञता नहीं। वे ऐसे निर्मोही निकले कि हमें छोड़कर चलते बने! अब तू ही बता, ऐसे अकृतज्ञके साथ हम क्या सन्धि करें? क्या तू अब भी कहता है कि उनपर विश्‍वास करना चाहिये?॥ १६॥

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