श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

काचिन्मधुकरं दृष्ट्वा ध्यायन्ती कृष्णसंगमम्।

प्रियप्रस्थापितं दूतं कल्पयित्वेदमब्रवीत्॥ ११

kācinmadhukaraṃ dṛṣṭvā dhyāyantī kṛṣṇasaṃgamam|

priyaprasthāpitaṃ dūtaṃ kalpayitvedamabravīt|| 11

अर्थ

एक गोपीको उस समय स्मरण हो रहा था भगवान् श्रीकृष्णके मिलनकी लीलाका। उसी समय उसने देखा कि पास ही एक भौंरा गुनगुना रहा है। उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्णने मनानेके लिये दूत भेजा हो। वह गोपी भौंरेसे इस प्रकार कहने लगी—॥ ११॥

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