एक गोपीको उस समय स्मरण हो रहा था भगवान् श्रीकृष्णके मिलनकी लीलाका। उसी समय उसने देखा कि पास ही एक भौंरा गुनगुना रहा है। उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्णने मनानेके लिये दूत भेजा हो। वह गोपी भौंरेसे इस प्रकार कहने लगी—॥ ११॥
काचिन्मधुकरं दृष्ट्वा ध्यायन्ती कृष्णसंगमम्।
प्रियप्रस्थापितं दूतं कल्पयित्वेदमब्रवीत्॥ ११
एक गोपीको उस समय स्मरण हो रहा था भगवान् श्रीकृष्णके मिलनकी लीलाका। उसी समय उसने देखा कि पास ही एक भौंरा गुनगुना रहा है। उसने ऐसा समझा मानो मुझे रूठी हुई समझकर श्रीकृष्णने मनानेके लिये दूत भेजा हो। वह गोपी भौंरेसे इस प्रकार कहने लगी—॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 423) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/11/