श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

सरिच्छैलवनोद्देशान् मुकुन्दपदभूषितान्।

आक्रीडानीक्षमाणानां मनो याति तदात्मताम्॥ २२

saricchailavanoddeśān mukundapadabhūṣitān|

ākrīḍānīkṣamāṇānāṃ mano yāti tadātmatām|| 22

अर्थ

जब हम देखते हैं कि यह वही नदी है, जिसमें श्रीकृष्ण जलक्रीडा करते थे; यह वही गिरिराज है, जिसे उन्होंने अपने एक हाथपर उठा लिया था; ये वे ही वनके प्रदेश हैं, जहाँ श्रीकृष्ण गौएँ चराते हुए बाँसुरी बजाते थे, और ये वे ही स्थान हैं, जहाँ वे अपने सखाओंके साथ अनेकों प्रकारके खेल खेलते थे; और साथ ही यह भी देखते हैं कि वहाँ उनके चरणचिह्न अभी मिटे नहीं हैं, तब उन्हें देखकर हमारा मन श्रीकृष्णमय हो जाता है॥ २२॥

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