श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

सर्वतः पुष्पितवनं द्विजालिकुलनादितम्।

हंसकारण्डवाकीर्णैः पद्मषण्डैश्‍च मण्डितम्॥ १३

sarvataḥ puṣpitavanaṃ dvijālikulanāditam|

haṃsakāraṇḍavākīrṇaiḥ padmaṣaṇḍaiśca maṇḍitam|| 13

अर्थ

चारों ओर वन-पंक्तियाँ फूलोंसे लद रही थीं। पक्षी चहक रहे थे और भौंरे गुंजार कर रहे थे। वहाँ जल और स्थल दोनों ही कमलोंके वनसे शोभायमान थे और हंस, बत्तख आदि पक्षी वनमें विहार कर रहे थे॥ १३॥

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