श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

तत् क्षन्तुमर्हथस्तात मातर्नौ परतन्त्रयोः।

अकुर्वतोर्वां शुश्रूषां क्लिष्टयोर्दुर्हृदा भृशम्॥ ९

tat kṣantumarhathastāta mātarnau paratantrayoḥ|

akurvatorvāṃ śuśrūṣāṃ kliṣṭayordurhṛdā bhṛśam|| 9

अर्थ

मेरी माँ और मेरे पिताजी! आप दोनों हमें क्षमा करें। हाय! दुष्ट कंसने आपको इतने-इतने कष्ट दिये, परंतु हम परतन्त्र रहनेके कारण आपकी कोई सेवा-शुश्रूषा न कर सके’॥ ९॥

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