श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

तयोः सपर्यां महतीं चक्रे भक्त्युपबृंहिताम्।

उवाचावनतः कृष्णं सर्वभूताशयालयम्।

लीलामनुष्य हे विष्णो युवयोः करवाम किम्॥ ४४

tayoḥ saparyāṃ mahatīṃ cakre bhaktyupabṛṃhitām|

uvācāvanataḥ kṛṣṇaṃ sarvabhūtāśayālayam|

līlāmanuṣya he viṣṇo yuvayoḥ karavāma kim|| 44

अर्थ

तब उसके शरीरका शंख लेकर भगवान् रथपर चले आये। वहाँसे बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने यमराजकी प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शंख बजाया। शंखका शब्द सुनकर सारी प्रजाका शासन करनेवाले यमराजने उनका स्वागत किया और भक्तिभावसे भरकर विधिपूर्वक उनकी बहुत बड़ी पूजा की। उन्होंने नम्रतासे झुककर समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान सच्चिदानन्द-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘लीलासे ही मनुष्य बने हुए सर्वव्यापक परमेश्‍वर! मैं आप दोनोंकी क्या सेवा करूँ?’॥ ४२—४४॥

यह अर्थ श्लोक 42–44 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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