श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

याः कृष्णरामजन्मर्क्षे मनोदत्ता महामतिः।

ताश्‍चाददादनुस्मृत्य कंसेनाधर्मतो हृताः॥ २८

yāḥ kṛṣṇarāmajanmarkṣe manodattā mahāmatiḥ|

tāścādadādanusmṛtya kaṃsenādharmato hṛtāḥ|| 28

अर्थ

महामति वसुदेवजीने भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीके जन्म-नक्षत्रमें जितनी गौएँ मन-ही-मन संकल्प करके दी थीं, उन्हें पहले कंसने अन्यायसे छीन लिया था। अब उनका स्मरण करके उन्होंने ब्राह्मणोंको वे फिरसे दीं॥ २८॥

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