‘पिताजी! आपने और माँ यशोदाने बड़े स्नेह और दुलारसे हमारा लालन-पालन किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माता-पिता सन्तानपर अपने शरीरसे भी अधिक स्नेह करते हैं॥ २१॥✎ 1674
पितर्युवाभ्यां स्निग्धाभ्यां पोषितौ लालितौ भृशम्।
पित्रोरभ्यधिका प्रीतिरात्मजेष्वात्मनोऽपि हि॥ २१
‘पिताजी! आपने और माँ यशोदाने बड़े स्नेह और दुलारसे हमारा लालन-पालन किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि माता-पिता सन्तानपर अपने शरीरसे भी अधिक स्नेह करते हैं॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 410) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/45/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)