श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

सिंचन्तावश्रुधाराभिः स्नेहपाशेन चावृतौ।

न किंचिदूचतू राजन् बाष्पकण्ठौ विमोहितौ॥ ११

siṃcantāvaśrudhārābhiḥ snehapāśena cāvṛtau|

na kiṃcidūcatū rājan bāṣpakaṇṭhau vimohitau|| 11

अर्थ

राजन्! वे स्नेह-पाशसे बँधकर पूर्णतः मोहित हो गये और आँसुओंकी धारासे उनका अभिषेक करने लगे। यहाँतक कि आँसुओंके कारण गला रुँध जानेसे वे कुछ बोल भी न सके॥ ११॥

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