ये भगवान् श्रीकृष्ण जगत्के समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके आधार हैं। यही रक्षक भी हैं। जो इनका बुरा चाहता है, इनका तिरस्कार करता है; वह कभी सुखी नहीं हो सकता॥ ४८॥
सर्वेषामिह भूतानामेष हि प्रभवाप्ययः।
गोप्ता च तदवध्यायी न क्वचित् सुखमेधते॥ ४८
ये भगवान् श्रीकृष्ण जगत्के समस्त प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयके आधार हैं। यही रक्षक भी हैं। जो इनका बुरा चाहता है, इनका तिरस्कार करता है; वह कभी सुखी नहीं हो सकता॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 407) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/48/