॥ श्रीहरिः ॥
अरत्नी द्वे अरत्निभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी।
शिरः शीर्ष्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतुः॥ ३
aratnī dve aratnibhyāṃ jānubhyāṃ caiva jānunī|
śiraḥ śīrṣṇorasorastāvanyonyamabhijaghnatuḥ|| 3
अर्थ
वे पंजोंसे पंजे, घुटनोंसे घुटने, माथेसे माथा और छातीसे छाती भिड़ाकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे॥ ३॥
अरत्नी द्वे अरत्निभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी।
शिरः शीर्ष्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतुः॥ ३
वे पंजोंसे पंजे, घुटनोंसे घुटने, माथेसे माथा और छातीसे छाती भिड़ाकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 402) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/3/