श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

अरत्‍नी द्वे अरत्‍निभ्यां जानुभ्यां चैव जानुनी।

शिरः शीर्ष्णोरसोरस्तावन्योन्यमभिजघ्नतुः॥ ३

aratnī dve aratnibhyāṃ jānubhyāṃ caiva jānunī|

śiraḥ śīrṣṇorasorastāvanyonyamabhijaghnatuḥ|| 3

अर्थ

वे पंजोंसे पंजे, घुटनोंसे घुटने, माथेसे माथा और छातीसे छाती भिड़ाकर एक-दूसरेपर चोट करने लगे॥ ३॥

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