श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

प्रवेपितः स रुधिरमुद्वमन् मुखतोऽर्दितः।

व्यसुः पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाङ्‌घ्रिपः॥ २५

pravepitaḥ sa rudhiramudvaman mukhato'rditaḥ|

vyasuḥ papātorvyupasthe vātāhata ivāṅghripaḥ|| 25

अर्थ

तमाचा लगनेसे वह काँप उठा और आँधीसे उखड़े हुए वृक्षके समान अत्यन्त व्यथित और अन्तमें प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २५॥

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