॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.44.22
नाचलत्तत्प्रहारेण मालाहत इव द्विपः।
बाह्वोर्निगृह्य चाणूरं बहुशो भ्रामयन् हरिः॥ २२
nācalattatprahāreṇa mālāhata iva dvipaḥ|
bāhvornigṛhya cāṇūraṃ bahuśo bhrāmayan hariḥ|| 22
अर्थ
परन्तु उसके प्रहारसे भगवान् तनिक भी विचलित न हुए, जैसे फूलोंके गजरेकी मारसे गजराज। उन्होंने चाणूरकी दोनों भुजाएँ पकड़ लीं और उसे अन्तरिक्षमें बड़े वेगसे कई बार घुमाकर धरतीपर दे मारा। परीक्षित्! चाणूरके प्राण तो घुमानेके समय ही निकल गये थे। उसकी वेष-भूषा अस्त-व्यस्त हो गयी, केश और मालाएँ बिखर गयीं, वह इन्द्रध्वज (इन्द्रकी पूजाके लिये खड़े किये गये बड़े झंडे) के समान गिर पड़ा॥ २२-२३॥