श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.44.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 44 · अथ चतुश्‍चत्वारिंशोऽध्यायः

भगवद्गात्रनिष्पातैर्वज्रनिष्पेषनिष्ठुरैः ।

चाणूरो भज्यमानांगो मुहुर्ग्लानिमवाप ह॥ २०

bhagavadgātraniṣpātairvajraniṣpeṣaniṣṭhuraiḥ |

cāṇūro bhajyamānāṃgo muhurglānimavāpa ha|| 20

अर्थ

भगवान्‌के अंग-प्रत्यंग वज्रसे भी कठोर हो रहे थे। उनकी रगड़से चाणूरकी रग-रग ढीली पड़ गयी। बार-बार उसे ऐसा मालूम हो रहा था मानो उसके शरीरके सारे बन्धन टूट रहे हैं। उसे बड़ी ग्लानि, बड़ी व्यथा हुई॥ २०॥

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