॥ श्रीहरिः ॥
पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।
जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्लिष्यन्त इव बाहुभिः॥ २१
pibanta iva cakṣurbhyāṃ lihanta iva jihvayā|
jighranta iva nāsābhyāṃ śliṣyanta iva bāhubhiḥ|| 21
अर्थ
मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों॥ २१॥
पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।
जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्लिष्यन्त इव बाहुभिः॥ २१
मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.43.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 399) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/43/21/