श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।

जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्‍लिष्यन्त इव बाहुभिः॥ २१

pibanta iva cakṣurbhyāṃ lihanta iva jihvayā|

jighranta iva nāsābhyāṃ śliṣyanta iva bāhubhiḥ|| 21

अर्थ

मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों, जिह्वासे चाट रहे हों, नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओंसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों॥ २१॥

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