॥ श्रीहरिः ॥
ततो रूपगुणौदार्यसम्पन्ना प्राह केशवम्।
उत्तरीयान्तमाकृष्य स्मयन्ती जातहृच्छया॥ ९
tato rūpaguṇaudāryasampannā prāha keśavam|
uttarīyāntamākṛṣya smayantī jātahṛcchayā|| 9
अर्थ
उसी क्षण कुब्जा रूप, गुण और उदारतासे सम्पन्न हो गयी। उसके मनमें भगवान्के मिलनकी कामना जाग उठी। उसने उनके दुपट्टेका छोर पकड़कर मुसकराते हुए कहा—॥ ९॥
ततो रूपगुणौदार्यसम्पन्ना प्राह केशवम्।
उत्तरीयान्तमाकृष्य स्मयन्ती जातहृच्छया॥ ९
उसी क्षण कुब्जा रूप, गुण और उदारतासे सम्पन्न हो गयी। उसके मनमें भगवान्के मिलनकी कामना जाग उठी। उसने उनके दुपट्टेका छोर पकड़कर मुसकराते हुए कहा—॥ ९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.42.9 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 393) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/42/9/