श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

ततो रूपगुणौदार्यसम्पन्‍ना प्राह केशवम्।

उत्तरीयान्तमाकृष्य स्मयन्ती जातहृच्छया॥ ९

tato rūpaguṇaudāryasampannā prāha keśavam|

uttarīyāntamākṛṣya smayantī jātahṛcchayā|| 9

अर्थ

उसी क्षण कुब्जा रूप, गुण और उदारतासे सम्पन्‍न हो गयी। उसके मनमें भगवान्‌के मिलनकी कामना जाग उठी। उसने उनके दुपट्टेका छोर पकड़कर मुसकराते हुए कहा—॥ ९॥

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