श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

प्रसन्‍नो भगवान् कुब्जां त्रिवक्रां रुचिराननाम्।

ऋज्वीं कर्तुं मनश्‍चक्रे दर्शयन् दर्शने फलम्॥ ६

prasanno bhagavān kubjāṃ trivakrāṃ rucirānanām|

ṛjvīṃ kartuṃ manaścakre darśayan darśane phalam|| 6

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण उस कुब्जापर बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्होंने अपने दर्शनका प्रत्यक्ष फल दिखलानेके लिये तीन जगहसे टेढ़ी किन्तु सुन्दर मुखवाली कुब्जाको सीधी करनेका विचार किया॥ ६॥

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