॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.42.28
अदर्शनं स्वशिरसः प्रतिरूपे च सत्यपि।
असत्यपि द्वितीये च द्वैरूप्यं ज्योतिषां तथा॥ २८
adarśanaṃ svaśirasaḥ pratirūpe ca satyapi|
asatyapi dvitīye ca dvairūpyaṃ jyotiṣāṃ tathā|| 28
अर्थ
जाग्रत्-अवस्थामें उसने देखा कि जल या दर्पणमें शरीरकी परछाईं तो पड़ती है, परन्तु सिर नहीं दिखायी देता; अँगुली आदिकी आड़ न होनेपर भी चन्द्रमा, तारे और दीपक आदिकी ज्योतियाँ उसे दो-दो दिखायी पड़ती हैं॥ २८॥