श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

तद्दर्शनस्मरक्षोभादात्मानं नाविदन् स्त्रियः।

विस्रस्तवासःकबरवलयालेख्यमूर्तयः ॥ १४

taddarśanasmarakṣobhādātmānaṃ nāvidan striyaḥ|

visrastavāsaḥkabaravalayālekhyamūrtayaḥ || 14

अर्थ

उनके दर्शनमात्रसे स्त्रियोंके हृदयमें प्रेमका आवेग, मिलनकी आकांक्षा जग उठती थी। यहाँतक कि उन्हें अपने शरीरकी भी सुध न रहती। उनके वस्त्र, जूड़े और कंगन ढीले पड़ जाते थे तथा वे चित्रलिखित मूर्तियोंके समान ज्यों-की-त्यों खड़ी रह जाती थीं॥ १४॥

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