श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.42.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 42 · अथ द्विचत्वारिंशोऽध्यायः

एष्यामि ते गृहं सुभ्रूः पुंसामाधिविकर्शनम्।

साधितार्थोऽगृहाणां नः पान्थानां त्वं परायणम्॥ १२

eṣyāmi te gṛhaṃ subhrūḥ puṃsāmādhivikarśanam|

sādhitārtho'gṛhāṇāṃ naḥ pānthānāṃ tvaṃ parāyaṇam|| 12

अर्थ

‘सुन्दरी! तुम्हारा घर संसारी लोगोंके लिये अपनी मानसिक व्याधि मिटानेका साधन है। मैं अपना कार्य पूरा करके अवश्य वहाँ आऊँगा। हमारे-जैसे बेघरके बटोहियोंको तुम्हारा ही तो आसरा है’॥ १२॥

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