श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

न हि वां विषमा दृष्टिः सुहृदोर्जगदात्मनोः।

समयोः सर्वभूतेषु भजन्तं भजतोरपि॥ ४७

na hi vāṃ viṣamā dṛṣṭiḥ suhṛdorjagadātmanoḥ|

samayoḥ sarvabhūteṣu bhajantaṃ bhajatorapi|| 47

अर्थ

यद्यपि आप प्रेम करनेवालोंसे ही प्रेम करते हैं, भजन करनेवालोंको ही भजते हैं—फिर भी आपकी दृष्टिमें विषमता नहीं है। क्योंकि आप सारे जगत‍्के परम सुहृद् और आत्मा हैं। आप समस्त प्राणियों और पदार्थोंमें समरूपसे स्थित हैं॥ ४७॥

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