श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

ऊचुः पौरा अहो गोप्यस्तपः किमचरन् महत्।

या ह्येतावनुपश्यन्ति नरलोकमहोत्सवौ॥ ३१

ūcuḥ paurā aho gopyastapaḥ kimacaran mahat|

yā hyetāvanupaśyanti naralokamahotsavau|| 31

अर्थ

भगवान्‌को देखकर सभी पुरवासी आपसमें कहने लगे—‘धन्य है! धन्य है!’ गोपियोंने ऐसी कौन-सी महान् तपस्या की है, जिसके कारण वे मनुष्यमात्रको परमानन्द देनेवाले इन दोनों मनोहर किशोरोंको देखती रहती हैं॥ ३१॥✎ 1930

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1930 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मत-वाले → मतवाले

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