श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

मनांसि तासामरविन्दलोचनः

प्रगल्भलीलाहसितावलोकनैः ।

जहार मत्तद्विरदेन्द्रविक्रमो

दृशां ददच्छ्रीरमणात्मनोत्सवम्॥ २७

manāṃsi tāsāmaravindalocanaḥ

pragalbhalīlāhasitāvalokanaiḥ |

jahāra mattadviradendravikramo

dṛśāṃ dadacchrīramaṇātmanotsavam|| 27

अर्थ

कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण मतवाले गजराजके समान बड़ी मस्तीसे चल रहे थे। उन्होंने लक्ष्मीको भी आनन्दित करनेवाले अपने श्यामसुन्दर विग्रहसे नगरनारियोंके नेत्रोंको बड़ा आनन्द दिया और अपनी विलासपूर्ण प्रगल्भ हँसी तथा प्रेमभरी चितवनसे उनके मन चुरा लिये॥ २७॥✎ 1930

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1930 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): मत-वाले → मतवाले

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