श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

अनित्यानात्मदुःखेषु विपर्ययमतिर्ह्यहम्।

द्वन्द्वारामस्तमोविष्टो न जाने त्वाऽऽत्मनः प्रियम्॥ २५

anityānātmaduḥkheṣu viparyayamatirhyaham|

dvandvārāmastamoviṣṭo na jāne tvā''tmanaḥ priyam|| 25

अर्थ

मेरी मूर्खता तो देखिये, प्रभो! मैंने अनित्य वस्तुओंको नित्य, अनात्माको आत्मा और दुःखको सुख समझ लिया। भला, इस उलटी बुद्धिकी भी कोई सीमा है! इस प्रकार अज्ञानवश सांसारिक सुख-दुःख आदि द्वन्द्वोंमें ही रम गया और यह बात बिलकुल भूल गया कि आप ही हमारे सच्चे प्यारे हैं॥ २५॥✎ 1671

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1671 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विज्ञान-घन → विज्ञानघन

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