वैष्णवजनों तथा यदुवंशियोंका पालन-पोषण करनेके लिये आपने ही अपनेको वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट किया है। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ २१॥✎ 1928
नमस्ते वासुदेवाय नमः संकर्षणाय च।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नमः॥ २१
वैष्णवजनों तथा यदुवंशियोंका पालन-पोषण करनेके लिये आपने ही अपनेको वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इस चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट किया है। मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.40.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 384) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/40/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1928 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदु-वंशियोंका → यदुवंशियोंका