श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

अग्‍निर्मुखं तेऽवनिरङ्‌घ्रिरीक्षणं

सूर्यो नभो नाभिरथो दिशः श्रुतिः।

द्यौः कं सुरेन्द्रास्तव बाहवोऽर्णवाः

कुक्षिर्मरुत् प्राणबलं प्रकल्पितम्॥ १३

agnirmukhaṃ te'vaniraṅghrirīkṣaṇaṃ

sūryo nabho nābhiratho diśaḥ śrutiḥ|

dyauḥ kaṃ surendrāstava bāhavo'rṇavāḥ

kukṣirmarut prāṇabalaṃ prakalpitam|| 13

अर्थ

अग्‍नि आपका मुख है। पृथ्वी चरण है। सूर्य और चन्द्रमा नेत्र हैं। आकाश नाभि है। दिशाएँ कान हैं। स्वर्ग सिर है। देवेन्द्रगण भुजाएँ हैं। समुद्र कोख है और यह वायु ही आपकी प्राणशक्तिके रूपमें उपासनाके लिये कल्पित हुई है॥ १३॥

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