श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

उपगुह्यात्मजामेवं रुदत्या दीनदीनवत्।

याचितस्तां विनिर्भर्त्स्य हस्तादाचिच्छिदे खलः॥ ७

upaguhyātmajāmevaṃ rudatyā dīnadīnavat|

yācitastāṃ vinirbhartsya hastādācicchide khalaḥ|| 7

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कन्याको अपनी गोदमें छिपाकर देवकीजीने अत्यन्त दीनताके साथ रोते-रोते याचना की। परन्तु कंस बड़ा दुष्ट था। उसने देवकीजीको झिड़ककर उनके हाथसे वह कन्या छीन ली॥ ७॥

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