श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

गिरा गद्गदयास्तौषीत् सत्त्वमालम्ब्य सात्वतः।

प्रणम्य मूर्ध्नावहितः कृतांजलिपुटः शनैः॥ ५७

girā gadgadayāstauṣīt sattvamālambya sātvataḥ|

praṇamya mūrdhnāvahitaḥ kṛtāṃjalipuṭaḥ śanaiḥ|| 57

अर्थ

अब अक्रूरजीने अपना साहस बटोरकर भगवान्‌के चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और वे उसके बाद हाथ जोड़कर बड़ी सावधानीसे धीरे-धीरे गद्गद स्वरसे भगवान्‌की स्तुति करने लगे॥ ५७॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे २
पूर्वार्धेऽक्रूरप्रतियाने एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः॥ ३९॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    न्धेऽक्रूरप्रतियानं नामैकोन०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 381)

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