॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.49
बृहत्कटितटश्रोणिकरभोरुद्वयान्वितम्।
चारुजानुयुगं चारुजंघायुगलसंयुतम्॥ ४९
bṛhatkaṭitaṭaśroṇikarabhorudvayānvitam|
cārujānuyugaṃ cārujaṃghāyugalasaṃyutam|| 49
अर्थ
स्थूल कटिप्रदेश और नितम्ब, हाथीकी सूँडके समान जाँघें, सुन्दर घुटने एवं पिंडलियाँ हैं। एड़ीके ऊपरकी गाँठें उभरी हुई हैं और लाल-लाल नखोंसे दिव्य ज्योतिर्मय किरणें फैल रही हैं। चरणकमलकी अंगुलियाँ और अंगूठे नयी और कोमल पँखुड़ियोंके समान सुशोभित हैं॥ ४९-५०॥ ✎ 2097