श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

तात सौम्यागतः कच्चित् स्वागतं भद्रमस्तु वः।

अपि स्वज्ञातिबन्धूनामनमीवमनामयम्॥ ४

tāta saumyāgataḥ kaccit svāgataṃ bhadramastu vaḥ|

api svajñātibandhūnāmanamīvamanāmayam|| 4

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—चाचाजी! आपका हृदय बड़ा शुद्ध है। आपको यात्रामें कोई कष्ट तो नहीं हुआ? स्वागत है। मैं आपकी मंगलकामना करता हूँ। मथुराके हमारे आत्मीय सुहृद्, कुटुम्बी तथा अन्य सम्बन्धी सब सकुशल और स्वस्थ हैं न?॥ ४॥✎ 1929

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1929 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): सौम्य-स्वभाव → सौम्यस्वभाव

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