बहुत-सी गोपियोंके सामने भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम, उनकी मन्द-मन्द मुसकान और हृदयको स्पर्श करनेवाली विचित्र पदोंसे युक्त मधुर वाणी नाचने लगी। वे उसमें तल्लीन हो गयीं। मोहित हो गयीं॥ १६॥
स्मरन्त्यश्चापराः शौरेरनुरागस्मितेरिताः।
हृदिस्पृशश्चित्रपदा गिरः संमुमुहुः स्त्रियः॥ १६
बहुत-सी गोपियोंके सामने भगवान् श्रीकृष्णका प्रेम, उनकी मन्द-मन्द मुसकान और हृदयको स्पर्श करनेवाली विचित्र पदोंसे युक्त मधुर वाणी नाचने लगी। वे उसमें तल्लीन हो गयीं। मोहित हो गयीं॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 375) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/16/