श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

पप्रच्छ सत्कृतं नन्दः कथं स्थ निरनुग्रहे।

कंसे जीवति दाशार्ह सौनपाला इवावयः॥ ४१

papraccha satkṛtaṃ nandaḥ kathaṃ stha niranugrahe|

kaṃse jīvati dāśārha saunapālā ivāvayaḥ|| 41

अर्थ

इस प्रकार सत्कार हो चुकनेपर नन्दरायजीने उनके पास आकर पूछा—‘अक्रूरजी! आपलोग निर्दयी कंसके जीते-जी किस प्रकार अपने दिन काटते हैं? अरे! उसके रहते आपलोगोंकी वही दशा है जो कसाईद्वारा पाली हुई भेड़ोंकी होती है॥ ४१॥

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