॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.38.4
ममैतद् दुर्लभं मन्य उत्तमश्लोकदर्शनम्।
विषयात्मनो यथा ब्रह्मकीर्तनं शूद्रजन्मनः॥ ४
mamaitad durlabhaṃ manya uttamaślokadarśanam|
viṣayātmano yathā brahmakīrtanaṃ śūdrajanmanaḥ|| 4
अर्थ
मैं बड़ा विषयी हूँ। ऐसी स्थितिमें, बड़े-बड़े सात्त्विक पुरुष भी जिनके गुणोंका ही गान करते रहते हैं, दर्शन नहीं कर पाते—उन भगवान्के दर्शन मेरे लिये अत्यन्त दुर्लभ हैं, ठीक वैसे ही, जैसे शूद्रकुलके बालकके लिये वेदोंका कीर्तन॥ ४॥✎ 1920