इसके बाद जब वे परम मनस्वी श्रीबलरामजीके सामने विनीत भावसे खड़े हो गये, तब उन्होंने उनको गले लगा लिया और उनका एक हाथ श्रीकृष्णने पकड़ा तथा दूसरा बलरामजीने। दोनों भाई उन्हें घर ले गये॥ ३७॥
संकर्षणश्च प्रणतमुपगुह्य महामनाः।
गृहीत्वा पाणिना पाणी अनयत् सानुजो गृहम्॥ ३७
इसके बाद जब वे परम मनस्वी श्रीबलरामजीके सामने विनीत भावसे खड़े हो गये, तब उन्होंने उनको गले लगा लिया और उनका एक हाथ श्रीकृष्णने पकड़ा तथा दूसरा बलरामजीने। दोनों भाई उन्हें घर ले गये॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 372) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/38/37/