श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.21

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

लब्धांगसंगं प्रणतं कृतांजलिं

मां वक्ष्यतेऽक्रूर ततेत्युरुश्रवाः।

तदा वयं जन्मभृतो महीयसा

नैवादृतो यो धिगमुष्य जन्म तत्॥ २१

labdhāṃgasaṃgaṃ praṇataṃ kṛtāṃjaliṃ

māṃ vakṣyate'krūra tatetyuruśravāḥ|

tadā vayaṃ janmabhṛto mahīyasā

naivādṛto yo dhigamuṣya janma tat|| 21

अर्थ

जब वे मेरा आलिंगन कर चुकेंगे और मैं हाथ जोड़, सिर झुकाकर उनके सामने खड़ा हो जाऊँगा तब वे मुझे ‘चाचा अक्रूर!’ इस प्रकार कहकर सम्बोधन करेंगे! क्यों न हो, इसी पवित्र और मधुर यशका विस्तार करनेके लिये ही तो वे लीला कर रहे हैं। तब मेरा जीवन सफल हो जायगा। भगवान् श्रीकृष्णने जिसको अपनाया नहीं, जिसे आदर नहीं दिया—उसके उस जन्मको, जीवनको धिक्कार है॥ २१॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें