श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

यस्याखिलामीवहभिः सुमङ्गलै-

र्वाचो विमिश्रा गुणकर्मजन्मभिः।

प्राणन्ति शुम्भन्ति पुनन्ति वै जगद्

यास्तद्विरक्ताः शवशोभना मताः॥ १२

yasyākhilāmīvahabhiḥ sumaṅgalai-

rvāco vimiśrā guṇakarmajanmabhiḥ|

prāṇanti śumbhanti punanti vai jagad

yāstadviraktāḥ śavaśobhanā matāḥ|| 12

अर्थ

जब समस्त पापोंके नाशक उनके परम मंगलमय गुण, कर्म और जन्मकी लीलाओंसे युक्त होकर वाणी उनका गान करती है, तब उस गानसे संसारमें जीवनकी स्फूर्ति होने लगती है, शोभाका संचार हो जाता है, सारी अपवित्रताएँ धुलकर पवित्रताका साम्राज्य छा जाता है; परन्तु जिस वाणीसे उनके गुण, लीला और जन्मकी कथाएँ नहीं गायी जातीं, वह तो मुर्दोंको ही शोभित करनेवाली है, होनेपर भी नहींके समान—व्यर्थ है॥ १२॥✎ 1920

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर

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