श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

तद्देहतः कर्कटिकाफलोपमाद्

व्यसोरपाकृष्य भुजं महाभुजः।

अ१विस्मितोऽयत्‍नहतारिरुत्स्मयैः

प्रसूनवर्षैर्दिविषद्भिरीडितः ॥ ९

taddehataḥ karkaṭikāphalopamād

vyasorapākṛṣya bhujaṃ mahābhujaḥ|

avismito'yatnahatārirutsmayaiḥ

prasūnavarṣairdiviṣadbhirīḍitaḥ || 9

अर्थ

उसका निष्प्राण शरीर फूला हुआ होनेके कारण गिरते ही पकी ककड़ीकी तरह फट गया। महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने उसके शरीरसे अपनी भुजा खींच ली। उन्हें इससे कुछ भी आश्‍चर्य या गर्व नहीं हुआ। बिना प्रयत्‍नके ही शत्रुका नाश हो गया। देवताओंको अवश्य ही इससे बड़ा आश्‍चर्य हुआ। वे प्रसन्‍न हो-होकर भगवान्‌के ऊपर पुष्प बरसाने और उनकी स्तुति करने लगे॥ ९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    सुविस्मितैः पद्मभवादिभिः सुरैः प्रसू०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 363)

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