॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.37.7
दन्ता निपेतुर्भगवद्भुजस्पृश-
स्ते केशिनस्तप्तमयस्पृशो यथा।
बाहुश्च तद्देहगतो महात्मनो
यथाऽऽमयः संववृधे उपेक्षितः॥ ७
dantā nipeturbhagavadbhujaspṛśa-
ste keśinastaptamayaspṛśo yathā|
bāhuśca taddehagato mahātmano
yathā''mayaḥ saṃvavṛdhe upekṣitaḥ|| 7
अर्थ
परीक्षित्! भगवान्का अत्यन्त कोमल करकमल भी उस समय ऐसा हो गया, मानो तपाया हुआ लोहा हो। उसका स्पर्श होते ही केशीके दाँत टूट-टूटकर गिर गये और जैसे जलोदर रोग उपेक्षा कर देनेपर बहुत बढ़ जाता है, वैसे ही श्रीकृष्णका भुजदण्ड उसके मुँहमें बढ़ने लगा॥ ७॥