श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

स तं निशाम्याभिमुखो मुखेन खं

पिबन्‍निवाभ्यद्रवदत्यमर्षणः ।

जघान पद‍्भ्यामरविन्दलोचनं

दुरासदश्‍चण्डजवो दुरत्ययः॥ ४

sa taṃ niśāmyābhimukho mukhena khaṃ

pibannivābhyadravadatyamarṣaṇaḥ |

jaghāna padbhyāmaravindalocanaṃ

durāsadaścaṇḍajavo duratyayaḥ|| 4

अर्थ

भगवान्‌को सामने आया देख वह और भी चिढ़ गया तथा उनकी ओर इस प्रकार मुँह फैलाकर दौड़ा, मानो आकाशको पी जायगा। परीक्षित्! सचमुच केशीका वेग बड़ा प्रचण्ड था। उसपर विजय पाना तो कठिन था ही, उसे पकड़ लेना भी आसान नहीं था। उसने भगवान्‌के पास पहुँचकर दुलत्ती झाड़ी॥ ४॥

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