श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

गुहापिधानं निर्भिद्य गोपान् निःसार्य कृच्छ्रतः।

स्तूयमानः सुरैर्गोपैः प्रविवेश स्वगोकुलम्॥ ३४

guhāpidhānaṃ nirbhidya gopān niḥsārya kṛcchrataḥ|

stūyamānaḥ surairgopaiḥ praviveśa svagokulam|| 34

अर्थ

अब भगवान् श्रीकृष्णने गुफाके द्वारपर लगे हुए चट्टानोंके पिहान तोड़ डाले और ग्वालबालोंको उस संकटपूर्ण स्थानसे निकाल लिया। बड़े-बड़े देवता और ग्वालबाल उनकी स्तुति करने लगे और भगवान् श्रीकृष्ण व्रजमें चले आये॥ ३४॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
व्योमासुरवधो नाम सप्तत्रिंशोऽध्यायः॥ ३७॥

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