श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

तस्य तत् कर्म विज्ञाय कृष्णः शरणदः सताम्।

गोपान् नयन्तं जग्राह वृकं हरिरिवौजसा॥ ३१

tasya tat karma vijñāya kṛṣṇaḥ śaraṇadaḥ satām|

gopān nayantaṃ jagrāha vṛkaṃ haririvaujasā|| 31

अर्थ

भक्तवत्सल भगवान् उसकी यह करतूत जान गये। जिस समय वह ग्वालबालोंको लिये जा रहा था, उसी समय उन्होंने, जैसे सिंह भेड़ियेको दबोच ले उसी प्रकार, उसे धर दबाया॥ ३१॥✎ 2095

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2095 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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