श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

विशुद्धविज्ञानघनं स्वसंस्थया

समाप्तसर्वार्थममोघवांछितम् ।

स्वतेजसा नित्यनिवृत्तमाया-

गुणप्रवाहं भगवन्तमीमहि॥ २३

viśuddhavijñānaghanaṃ svasaṃsthayā

samāptasarvārthamamoghavāṃchitam |

svatejasā nityanivṛttamāyā-

guṇapravāhaṃ bhagavantamīmahi|| 23

अर्थ

प्रभो! आप विशुद्ध विज्ञानघन हैं। आपके स्वरूपमें और किसीका अस्तित्व है ही नहीं। आप नित्य-निरन्तर अपने परमानन्दस्वरूपमें स्थित रहते हैं। इसलिये सारे पदार्थ आपको नित्य प्राप्त ही हैं। आपका संकल्प अमोघ है। आपकी चिन्मयी शक्तिके सामने माया और मायासे होनेवाला यह त्रिगुणमय संसार-चक्र नित्यनिवृत्त है—कभी हुआ ही नहीं। ऐसे आप अखण्ड, एकरस, सच्चिदानन्दस्वरूप, निरतिशय ऐश्‍वर्यसम्पन्‍न भगवान्‌की मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥ २३॥

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