॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.37.23
विशुद्धविज्ञानघनं स्वसंस्थया
समाप्तसर्वार्थममोघवांछितम् ।
स्वतेजसा नित्यनिवृत्तमाया-
गुणप्रवाहं भगवन्तमीमहि॥ २३
viśuddhavijñānaghanaṃ svasaṃsthayā
samāptasarvārthamamoghavāṃchitam |
svatejasā nityanivṛttamāyā-
guṇapravāhaṃ bhagavantamīmahi|| 23
अर्थ
प्रभो! आप विशुद्ध विज्ञानघन हैं। आपके स्वरूपमें और किसीका अस्तित्व है ही नहीं। आप नित्य-निरन्तर अपने परमानन्दस्वरूपमें स्थित रहते हैं। इसलिये सारे पदार्थ आपको नित्य प्राप्त ही हैं। आपका संकल्प अमोघ है। आपकी चिन्मयी शक्तिके सामने माया और मायासे होनेवाला यह त्रिगुणमय संसार-चक्र नित्यनिवृत्त है—कभी हुआ ही नहीं। ऐसे आप अखण्ड, एकरस, सच्चिदानन्दस्वरूप, निरतिशय ऐश्वर्यसम्पन्न भगवान्की मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥ २३॥