यह बड़े आनन्दकी बात है कि आपने खेल-ही-खेलमें घोड़ेके रूपमें रहनेवाले इस केशी दैत्यको मार डाला। इसकी हिनहिनाहटसे डरकर देवतालोग अपना स्वर्ग छोड़कर भाग जाया करते थे॥ १५॥✎ 192120932094
दिष्ट्या ते निहतो दैत्यो लीलयायं हयाकृतिः।
यस्य हेषितसंत्रस्तास्त्यजन्त्यनिमिषा दिवम्॥ १५
यह बड़े आनन्दकी बात है कि आपने खेल-ही-खेलमें घोड़ेके रूपमें रहनेवाले इस केशी दैत्यको मार डाला। इसकी हिनहिनाहटसे डरकर देवतालोग अपना स्वर्ग छोड़कर भाग जाया करते थे॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.37.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 364) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/37/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
#1921 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदुवंश-शिरोमणि → यदुवंशशिरोमणि