तब उन्होंने ‘डरनेकी कोई बात नहीं है’—यह कहकर सबको ढाढ़स बँधाया और फिर वृषासुरको ललकारा, ‘अरे मूर्ख! महादुष्ट! तू इन गौओं और ग्वालोंको क्यों डरा रहा है? इससे क्या होगा॥ ७॥
मा भैष्टेति गिराऽऽश्वास्य वृषासुरमुपाह्वयत्।
गोपालैः पशुभिर्मन्द त्रासितैः किमसत्तम॥ ७
तब उन्होंने ‘डरनेकी कोई बात नहीं है’—यह कहकर सबको ढाढ़स बँधाया और फिर वृषासुरको ललकारा, ‘अरे मूर्ख! महादुष्ट! तू इन गौओं और ग्वालोंको क्यों डरा रहा है? इससे क्या होगा॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.36.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 357) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/36/7/