‘अक्रूरजी! आप तो बड़े उदार दानी हैं। सब तरहसे मेरे आदरणीय हैं। आज आप मेरा एक मित्रोचित काम कर दीजिये; क्योंकि भोजवंशी और वृष्णिवंशी यादवोंमें आपसे बढ़कर मेरी भलाई करनेवाला दूसरा कोई नहीं है॥ २८॥
भो भो दानपते मह्यं क्रियतां मैत्रमादृतः।
नान्यस्त्वत्तो हिततमो विद्यते भोजवृष्णिषु॥ २८
‘अक्रूरजी! आप तो बड़े उदार दानी हैं। सब तरहसे मेरे आदरणीय हैं। आज आप मेरा एक मित्रोचित काम कर दीजिये; क्योंकि भोजवंशी और वृष्णिवंशी यादवोंमें आपसे बढ़कर मेरी भलाई करनेवाला दूसरा कोई नहीं है॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.36.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 359) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/36/28/