श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

रम्भमाणः खरतरं पदा च विलिखन् महीम्।

उद्यम्य पुच्छं वप्राणि विषाणाग्रेण चोद्धरन्॥ २

rambhamāṇaḥ kharataraṃ padā ca vilikhan mahīm|

udyamya pucchaṃ vaprāṇi viṣāṇāgreṇa coddharan|| 2

अर्थ

वह बड़े जोरसे गर्ज रहा था और पैरोंसे धूल उछालता जाता था। पूँछ खड़ी किये हुए था और सींगोंसे चहारदीवारी, खेतोंकी मेंड़ आदि तोड़ता जाता था ॥ २॥

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