श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.35.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 35 · अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

हन्त चित्रमबलाः शृणुतेदं

हारहास उरसि स्थिरविद्युत्।

नन्दसूनुरयमार्तजनानां

नर्मदो यर्हि कूजितवेणुः॥ ४

hanta citramabalāḥ śṛṇutedaṃ

hārahāsa urasi sthiravidyut|

nandasūnurayamārtajanānāṃ

narmado yarhi kūjitaveṇuḥ|| 4

अर्थ

अरी गोपियो! तुम यह आश्‍चर्यकी बात सुनो! ये नन्दनन्दन कितने सुन्दर हैं। जब वे हँसते हैं तब हास्यरेखाएँ हारका रूप धारण कर लेती हैं, शुभ्र मोती-सी चमकने लगती हैं। अरी वीर! उनके वक्षः-स्थलपर लहराते हुए हारमें हास्यकी किरणें चमकने लगती हैं। उनके वक्षःस्थलपर जो श्रीवत्सकी सुनहली रेखा है, वह तो ऐसी जान पड़ती है, मानो श्याम मेघपर बिजली ही स्थिररूपसे बैठ गयी है। वे जब दुःखीजनोंको सुख देनेके लिये, विरहियोंके मृतक शरीरमें प्राणोंका संचार करनेके लिये बाँसुरी बजाते हैं, तब व्रजके झुंड-के-झुंड बैल, गौएँ और हरिन उनके पास ही दौड़ आते हैं। केवल आते ही नहीं, सखी! दाँतोंसे चबाया हुआ घासका ग्रास उनके मुँहमें ज्यों-का-त्यों पड़ा रह जाता है, वे उसे न निगल पाते और न तो उगल ही पाते हैं। दोनों कान खड़े करके इस प्रकार स्थिरभावसे खड़े हो जाते हैं, मानो सो गये हैं या केवल भीतपर लिखे हुए चित्र हैं। उनकी ऐसी दशा होना स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह बाँसुरीकी तान उनके चित्तको चुरा लेती है॥ ४-५॥

यह अर्थ श्लोक 4–5 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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