॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.35.25
यदुपतिर्द्विरदराजविहारो
यामिनीपतिरिवैष दिनान्ते।
मुदितवक्त्र उपयाति दुरन्तं
मोचयन् व्रजगवां दिनतापम्॥ २५
yadupatirdviradarājavihāro
yāminīpatirivaiṣa dinānte|
muditavaktra upayāti durantaṃ
mocayan vrajagavāṃ dinatāpam|| 25
अर्थ
सखी! देखो कैसा सौन्दर्य है! मदभरी आँखें कुछ चढ़ी हुई हैं। कुछ-कुछ ललाई लिये हुए कैसी भली जान पड़ती हैं। गलेमें वनमाला लहरा रही है। सोनेके कुण्डलोंकी कान्तिसे वे अपने कोमल कपोलोंको अलंकृत कर रहे हैं। इसीसे मुँहपर अधपके बेरके समान कुछ पीलापन जान पड़ता है और रोम-रोमसे विशेष करके मुखकमलसे प्रसन्नता फूटी पड़ती है। देखो, अब वे अपने सखा ग्वालबालोंका सम्मान करके उन्हें विदा कर रहे हैं। देखो, देखो सखी! व्रज-विभूषण श्रीकृष्ण गजराजके समान मदभरी चालसे इस सन्ध्या वेलामें हमारी ओर आ रहे हैं। अब व्रजमें रहनेवाली गौओंका, हमलोगोंका दिनभरका असह्य विरह-ताप मिटानेके लिये उदित होनेवाले चन्द्रमाकी भाँति ये हमारे प्यारे श्यामसुन्दर समीप चले आ रहे हैं॥ २४-२५॥