श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.35.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 35 · अथ पञ्चत्रिंशोऽध्यायः

मणिधरः क्वचिदागणयन् गा

मालया दयितगन्धतुलस्याः।

प्रणयिनोऽनुचरस्य कदांसे

प्रक्षिपन् भुजमगायत यत्र॥ १८

maṇidharaḥ kvacidāgaṇayan gā

mālayā dayitagandhatulasyāḥ|

praṇayino'nucarasya kadāṃse

prakṣipan bhujamagāyata yatra|| 18

अर्थ

अरी वीर! उनके गलेमें मणियोंकी माला बहुत ही भली मालूम होती है। तुलसीकी मधुर गन्ध उन्हें बहुत प्यारी है। इसीसे तुलसीकी मालाको तो वे कभी छोड़ते ही नहीं, सदा धारण किये रहते हैं। जब वे श्यामसुन्दर उस मणियोंकी मालासे गौओंकी गिनती करते-करते किसी प्रेमी सखाके गलेमें बाँह डाल देते हैं और भाव बता-बताकर बाँसुरी बजाते हुए गाने लगते हैं, उस समय बजती हुई उस बाँसुरीके मधुर स्वरसे मोहित होकर कृष्णसार मृगोंकी पत्‍नी हरिनियाँ भी अपना चित्त उनके चरणोंपर निछावर कर देती हैं और जैसे हम गोपियाँ अपने घर-गृहस्थीकी आशा-अभिलाषा छोड़कर गुणसागर नागर नन्दनन्दनको घेरे रहती हैं, वैसे ही वे भी उनके पास दौड़ आती हैं और वहीं एकटक देखती हुई खड़ी रह जाती हैं, लौटनेका नाम भी नहीं लेतीं॥ १८-१९॥

यह व्याख्या श्लोक 10.35.18 से 10.35.19 तककी एक साथ है।

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